भगवान् शिव देवी गौरा के साथ
सितम्बर का महीना शुरू होते ही मुझे हरतालिका तीज का इंतज़ार हो जाता है। भगवान् शिवजी जी की छवि देवी गौर के साथ तो और भी ज्यादा मनोहारी लगती है। और हरतालिका तीज का पर्व ही इन दोनों के विवाह के दिन ही मनाया जाता है। मुझे इंतज़ार कुछ इसलिए भी ज्यादा रहता है क्योंकि उस दिन सब कुछ अलग अलग सा और दिनों से बेहतर विशेषता लिए हुए लगता है।
ऐसा सिर्फ लिख ही नहीं रही हूँ मैं, वास्तव में बचपन से मेरे मन में यही अनुभव रहा है हरतालिका तीज के दिन का। मैंने कभी व्रत भी नहीं रखा सिर्फ अपनी माँ को निर्जल व्रत रखते देखा है। फिर वो पूरी रात का जागरण रखती है हमेशा और मेरी कोशिश रहती थी की मैं भी अपनी माँ के साथ पूरी रात जागूं और भगवान् के भजन में उनका साथ दूं। पर मेरी माँ हमेशा मुझे कुछ देर में सुला देती थी, कभी कहती की बेटा सुबह स्कूल भी तो जाना है, कभी कहती की तबियत खराब हो जाएगी, और कभी-कभी तो मैं खुद ही जागने का प्राण लिए सो जाती। .........

पर फिर भी ये दिन आज तक मेरे लिए ख़ास है। आश्चर्य होता है की कैसे कोई पुरे दिन बिना कुछ खाए-पिए रह सकता है। मुझे पहले ये भी अजीब लगता था की सिर्फ माँ ही व्रत क्यों रखती है पापा को भी तो कुछ करना चाहिए माँ के लिए! पर वो तो अलग विषय है। अभी मै सिर्फ हरतालिका तीज के बारे में लिखना चाहती हूँ। मुझे बहुत आनंद मिलता था जब मोहल्ले की सारी आंटी जी लोग मेरी माँ के साथ ही पूजा करने आती थी, फिर मेरी माँ पंडित जी को बुलाती, सबको पूजा की विधि बताती और फिर हम लोग पूजा में बैठ जाते , 'हरतालिका तीज व्रत कथा' सुनने को।

कभी कथा में बहुत गंभीरता लगती, कभी थोड़ी सी हंसी भी आ जाती थी, ख़ास तौर पे जब ये ज़िक्र आता था की यदि इस व्रत के दिन किसी स्त्री ने पानी पिया तो वो घुन और यदि मीठा खाया तो चींटी बन जायेगी। पर जो भी हो, ये दिन अपने आप में विशेषता लिए हुए है। एक तो इस दिन पूजा के वक़्त या पूजा के बाद बारिश ज़रूर होती है (ज़्यादातर मैंने देखा है), फिर रात के खाने में हमेशा कुछ ख़ास बनता है जैसे की घर में कोई दावत हो! और सबसे ज्यादा सुकून मिलता है भगवान् शिवजी के भजन गाते वक़्त। मै और मेरी बहिन , माँ के साथ मिलकर खूब देर तक बहुत सारे भजन गाते हैं और साथ ही में आंटी जी लोगो के भजनों में उनका साथ भी देते हैं।
और अंत में जब सुबह के वक़्त माँ पूजा के बाद भगवानजी की मूर्ति विसर्जित करने जाती, तो हम लोग भी साथ हो लेते। इस दिन हम सोते भी थे तो बिलकुल कच्ची नींद जैसे ही आहात हुई माँ की हम तुरंत जाग के बैठ जाते। सुबह भी माँ जब पूजा की तैय्यारी करती रहती, हम भी नहा धोकर तैयार हो जाते साथ जाने के लिए। आखिर आज के दिन ही तो हमरे सबसे प्रिय भगवान् शंकर जी की इतनी ज्यादा पूजा का अवसर मिलता है।
और विसर्जन के बाद वक़्त आता था सभी लोगो को प्रसाद बांटने का .......... ये भी अपने आप में एक बहुत ही सुकून देने वाला काम है जो की मुझे बहुत पसंद आता।
अब तो ज़िन्दगी की कई और यादें भी जुड़ गयी हैं इस दिन के साथ, तो और भी इंतज़ार रहने लगा है। इस महीने फिर मुझे इंतज़ार है 18 तारिख का , जब मुझे फिर से हरतालिका तीज मनाने का अवसर मिलेगा।
- अपराजिता